वन विभाग पर सवाल: RTI कार्यकर्ता ने मांगी जानकारी, सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर टालमटोल लाखों का है घोटाला…
संवाददाता.. छत्तीसगढ़ दस्तक 24 बलौदा बाजार(डोंगरा)
1 सितंबर 2025

सूचना के अधिकार के तहत पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने वाले अधिनियम को एक बार फिर वन विभाग द्वारा चुनौती दी गई है। आरटीआई एक्टिविस्ट दिलेराम सेन द्वारा वन परिक्षेत्र अधिकारी, अर्जुनी — रूपेंद्र कुमार साहू के अधिकार क्षेत्र में प्रयोग किए गए विभागीय वाहनों की लॉगबुक और ईंधन व्यय की जानकारी मांगी गई थी। लेकिन अधिकारी ने जानकारी देने से इंकार करते हुए इसे “निजता का मामला” बताया और सुप्रीम कोर्ट के SLP (C) नंबर 27734 / 2012 का हवाला दे दिया।जानकारी देने से किया इनकार, अपील में भी वही रुखदिलेराम सेन ने इस निर्णय के खिलाफ 16 जुलाई 2025 को वन मंडल अधिकारी, बलौदा बाजार कार्यालय में प्रथम अपील दायर की। परंतु अपीलीय अधिकारी ने भी उसी आधार पर जानकारी देने से इंकार कर दिया। साथ ही द्वितीय अपील के लिए गलत पता — राज्य सूचना आयोग, शास्त्री चौक रायपुर का उल्लेख किया, जबकि आयोग पिछले पाँच वर्षों से नया रायपुर (इंद्रावती भवन, नॉर्थ ब्लॉक, सेक्टर 19, अटल नगर) में कार्यरत है। इससे जानबूझकर गुमराह करने की आशंका भी जताई जा रही है।पहले भी मिल चुका है आदेश जानकारी देने कादिलचस्प बात यह है कि इसी प्रकार के मामले में राज्य सूचना आयुक्त नरेंद्र कुमार शुक्ल ने प्रकरण क्रमांक A/2748/2023 में दिनांक 16 अप्रैल 2024 को आदेश पारित कर जानकारी देने को बाध्य किया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि सूचना देने से इनकार का कोई वैधानिक औचित्य नहीं है।
RTI से हुआ बड़ा खुलासा: एक वाहन पर 3.14 लाख रुपये खर्च
इसके अतिरिक्त, दिलेराम सेन द्वारा मांगी गई एक अन्य आरटीआई में यह सामने आया कि वित्तीय वर्ष 2024–2025 में वन परीक्षेत्र अर्जुनी के एक विभागीय वाहन क्रमांक CG 04 5149 पर लगभग ₹3,14,733 रुपये का ईंधन व्यय किया गया है। यह आंकड़ा सवाल खड़े करता है कि जब जानकारी गोपनीय थी, तब ये आंकड़े कैसे उजागर हुए? और यदि उजागर हो सकते हैं, तो पहले इन्हें देने से मना क्यों किया गया?राज्य सूचना आयोग में दायर की गई दंडात्मक कार्रवाई की मांगइन सभी तथ्यों के आधार पर, दिलेराम सेन ने राज्य सूचना आयोग में RTI अधिनियम की धारा 20(1) एवं 20(2) के तहत संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की मांग करते हुए आवेदन प्रस्तुत किया है।
पारदर्शिता बनाम नौकरशाही का प्रतिरोधयह मामला न केवल एक साधारण आरटीआई से जुड़ा है, बल्कि यह बताता है कि कैसे कुछ सरकारी विभाग आज भी सूचना के अधिकार जैसे मजबूत औजार को खतरे में डाल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की आड़ में नागरिकों को उनका मूलभूत अधिकार से वंचित किया जा रहा है।राज्य सूचना आयोग का अगला निर्णय इस बात पर निर्णायक होगा कि छत्तीसगढ़ में सूचना का अधिकार कितना प्रभावी और सम्मानित है।







